हरिश्चन्द्र एक ऐसे राजा के रूप में प्रसिद्ध थे जो सत्य का आदर करते थे। कथा में उनके दिए हुए वचन की बहुत कठिन परीक्षा होती है। उन्हें राजमहल छोड़ना पड़ता है और परिवार से अलग रहना पड़ता है। आराम और सम्मान खो जाने पर भी वे अपने वचन को हल्का नहीं समझते।
एक समय वे श्मशान में काम करते हैं। उनकी पत्नी अपने पुत्र को लेकर वहाँ आती हैं। परिवार बहुत दुख में है। राजा के सामने अपने प्रियजनों का दुख और काम का नियम एक साथ आ जाते हैं। कहानी इस कठिन क्षण को उनकी सबसे बड़ी परीक्षा बताती है।
अन्त में देवता और ऋषि प्रकट होते हैं। परिवार फिर मिलता है और सत्यनिष्ठा का सम्मान होता है। कथा का सुखद अन्त उस कठिन रास्ते के बाद आता है।
बच्चे इससे ईमानदारी का मूल्य सीख सकते हैं। साथ ही, सच बोलने का अर्थ किसी के दुख की उपेक्षा करना नहीं है। करुणा और सत्य को साथ लेकर चलना और कठिन परिस्थिति में सहायता माँगना भी आवश्यक है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित।
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