रामायण में राजा दशरथ एक पुराने दुखद प्रसंग को याद करते हैं। वन में रहने वाला एक युवा अपने दृष्टिहीन माता-पिता की देखभाल करता था। वे उसके सहारे रहते थे। युवा उनके लिए पानी लेने नदी के पास गया। लोकपरम्परा में यही सेवाभावी पुत्र श्रवण कुमार के नाम से प्रसिद्ध है।
दशरथ ने जल भरने की आवाज को किसी पशु की आवाज समझ लिया और बिना देखे बाण चला दिया। उन्हें अपनी भूल का पता चला तो वे अत्यन्त दुखी हुए। युवक ने अपने माता-पिता की चिन्ता की और राजा से उन तक पानी तथा समाचार पहुँचाने को कहा।
दशरथ ने माता-पिता के सामने सत्य स्वीकार किया। इस घटना का शोक उनके जीवन में बना रहा। रामायण आगे इसे दशरथ के पुत्र-वियोग से भी जोड़ती है।
कहानी के दो भाव याद रखने योग्य हैं: परिवार में जिन्हें सहायता चाहिए, उनका ध्यान रखना; और किसी भी काम से पहले पूरी बात देखना-समझना। अनुमान के आधार पर किया गया असावधान कार्य दूसरों को बड़ा दुख दे सकता है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित।
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