बच्चों के लिए धार्मिक कथाएँ · देवनागरी पाठ
एकलव्य की गुरु भक्ति
बच्चों के लिए सरल हिन्दी कथारूपान्तरण।
स्रोत: स्रोत-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी रूपान्तरण · संदर्भ पाठ
एकलव्य की गुरु भक्ति — हिन्दी रूपान्तरण
एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहते थे। वे द्रोणाचार्य के पास पहुँचे, पर उन्हें शिष्य के रूप में स्थान नहीं मिला। उन्होंने अभ्यास छोड़ने के बजाय वन में द्रोण की प्रतिमा बनाई और लगातार सीखने का प्रयास किया।
समय बीता और उनका कौशल बहुत बढ़ गया। जब द्रोण और राजकुमारों को उसके बारे में पता चला, सब चकित हुए। एकलव्य ने द्रोण को अपना गुरु माना। कथा के आगे द्रोण ने गुरु-दक्षिणा में उनका दाहिना अंगूठा माँगा। एकलव्य ने उस अत्यन्त कठिन माँग को स्वीकार किया।
यह प्रसंग केवल आज्ञापालन की सरल प्रशंसा नहीं है। यह शिक्षा तक पहुँच, गुरु की जिम्मेदारी और प्रतिभाशाली विद्यार्थी के साथ न्याय जैसे कठिन प्रश्न भी उठाता है। महाभारत ऐसी उलझनों को पाठक के सामने रखता है।
एकलव्य की लगन और नियमित अभ्यास से प्रेरणा ली जा सकती है। किसी भी विद्यार्थी की प्रतिभा का सम्मान होना चाहिए। सीखने या किसी को प्रसन्न करने के लिए अपने शरीर को नुकसान पहुँचाना आवश्यक या उचित नहीं है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित। https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-01-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-142&oldid=54395