कृष्ण और अर्जुन का सम्बन्ध केवल योद्धा और सारथी का नहीं था। वे मित्र भी थे। युद्धभूमि में अपने परिजनों और गुरुओं को सामने देखकर अर्जुन का मन विचलित हुआ। उन्होंने अपना संशय छिपाया नहीं; कृष्ण से कहा कि उन्हें मार्गदर्शन चाहिए।
कृष्ण ने उनकी बात सुनी और जीवन, कर्तव्य, आत्मा तथा कर्म के विषय में समझाया। भगवद्गीता का संवाद प्रश्न और उत्तर से आगे बढ़ता है। अर्जुन कभी समझते हैं, कभी फिर पूछते हैं। मित्रता में सच्ची बात कह सकना इस संवाद का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
विश्वरूप-दर्शन के समय अर्जुन ने कृष्ण की व्यापकता देखकर आश्चर्य और विनम्रता व्यक्त की। उन्होंने सहज मित्रता में कही गई बातों के लिए क्षमा भी माँगी। अन्त में कृष्ण ने विचार करके निर्णय लेने की जगह अर्जुन को दी।
इस कहानी में अच्छे मित्र का अर्थ हर बात पर हाँ कहना नहीं है। सही समय पर सुनना, कठिन प्रश्न समझाना और सोचने में सहायता करना भी मित्रता है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
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