प्रजापति दक्ष की पुत्री सती शिव की पत्नी थीं। दक्ष शिव के प्रति आदर नहीं रखते थे। जब उन्होंने बड़ा यज्ञ किया, तो शिव को सम्मानपूर्वक आमन्त्रित नहीं किया। सती को पिता के घर होने वाले आयोजन का समाचार मिला और वे वहाँ जाना चाहती थीं। शिव ने सम्भावित अपमान की ओर उनका ध्यान दिलाया।
सती यज्ञस्थल पहुँचीं। वहाँ पिता का व्यवहार और शिव के प्रति अनादर देखकर उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने कहा कि शिव का बाह्य रूप देखकर उनकी निन्दा करना उनकी वास्तविक महिमा को न समझना है। भागवत के वर्णन में सती ने योग के द्वारा उस शरीर का त्याग किया जो दक्ष से सम्बन्धित था। यह पौराणिक प्रसंग है, किसी आचरण का अनुकरण करने का निर्देश नहीं।
समाचार पाकर शिव अत्यन्त क्रुद्ध हुए। वीरभद्र और गणों ने यज्ञ को रोक दिया और दक्ष को दण्ड मिला। इसके बाद देवता ब्रह्मा के साथ शिव को प्रसन्न करने गए। शिव का क्रोध अन्ततः करुणा में बदला; दक्ष को जीवन मिला और यज्ञ फिर पूर्ण हुआ।
दक्ष ने अपना अहंकार स्वीकार किया। कथा केवल दण्ड पर समाप्त नहीं होती; वह अपमान, अहंकार, विवेक और पुनः मेल की सम्भावना तक पहुँचती है। शिव और विष्णु के बीच भेद से उत्पन्न वैमनस्य छोड़ने का सन्देश भी अन्तिम प्रसंग में मिलता है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं।
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