हिरण्यकशिपु अपने बल और वरदान के कारण स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा था। वह चाहता था कि सब उसी की आज्ञा मानें। उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था। प्रह्लाद की दृष्टि में भगवान केवल किसी मन्दिर में नहीं, सब प्राणियों और समस्त जगत में विद्यमान थे।
गुरुकुल में भी प्रह्लाद अपने साथियों से भक्ति, सद्भाव और जीवन के सदुपयोग की बात करते थे। पिता के भय और विरोध से उनका विश्वास नहीं बदला। हिरण्यकशिपु ने पूछा कि उसे चुनौती देने वाला विष्णु कहाँ है। प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि भगवान सर्वत्र हैं।
राजा ने सभा के एक स्तम्भ की ओर संकेत करके पूछा कि क्या उसमें भी विष्णु हैं। फिर उसने स्तम्भ पर प्रहार किया। उससे नरसिंह प्रकट हुए—न पूर्ण मनुष्य, न पूर्ण पशु। संध्या के समय, द्वार की देहरी पर, अपने नखों से उन्होंने अत्याचारी का अन्त किया। कथा इन परिस्थितियों को हिरण्यकशिपु के वरदान की सीमाओं से जोड़कर समझाती है।
देवता भी नरसिंह के उग्र रूप के निकट जाने में संकोच कर रहे थे। प्रह्लाद ने प्रणाम और स्तुति की। उन्होंने अपने पिता के कल्याण की प्रार्थना की और भक्ति के बदले सांसारिक सौदा करने की इच्छा नहीं जताई। भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया। इस कथा का केन्द्र भय के बीच स्थिर विश्वास और शक्ति के साथ करुणा का सम्बन्ध है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं।
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