राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव अपनी सौतेली माता सुरुचि के कठोर वचनों से बहुत दुखी हुए। वे पिता की गोद में बैठना चाहते थे, पर उन्हें रोक दिया गया। माता सुनीति ने बालक को किसी से द्वेष रखने के बजाय भगवान की शरण लेने की प्रेरणा दी। ध्रुव ने ऐसा स्थान पाने का निश्चय किया जिसे कोई छीन न सके।
वन में नारद मिले। उन्होंने बालक की कठिन यात्रा देखकर पहले उसे समझाया, फिर उसकी दृढ़ता जानकर विष्णु की उपासना का मार्ग बताया। ध्रुव ने मधुवन में मन को एकाग्र किया। कथा में उनके तप का वर्णन असाधारण साधना के रूप में है; उसका केन्द्र अटल स्मरण और भीतर के विक्षोभ पर विजय है।
भगवान विष्णु प्रकट हुए तो ध्रुव उनके दर्शन से अभिभूत रह गए। भगवान के शंख के स्पर्श से उन्हें स्तुति करने की सामर्थ्य मिली। जिस बालक ने अपमान के कारण बड़ा पद माँगने की इच्छा की थी, उसका मन अब भगवान की भक्ति में बदल चुका था। उन्हें लगा कि अनमोल रत्न पाकर भी वे पहले काँच का टुकड़ा खोज रहे थे।
ध्रुव को पिता के राज्य में लौटकर अपना कर्तव्य निभाने और आगे चलकर अचल ध्रुवपद पाने का वर मिला। पिता और परिवार ने उनका स्वागत किया। इस प्रसंग में धैर्य का अर्थ केवल किसी इच्छा पर अड़े रहना नहीं है; साधना के साथ इच्छा, क्रोध और आत्मबोध का बदलना भी है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं।
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