हिमवान और मैना की पुत्री पार्वती बचपन से शिव के प्रति श्रद्धा रखती थीं। शिव तप में स्थित थे। पार्वती ने उन्हें जीवनसाथी के रूप में पाने का निश्चय किया और दृढ़ तपस्या की। कथानक में उनकी साधना बाहरी रूप से अधिक निष्ठा और एकाग्र संकल्प की परीक्षा है।
शिव ने ब्राह्मण-वेष में आकर उनसे पूछा कि वे ऐसे विरक्त योगी को क्यों चाहती हैं जिसका वेश साधारण सामाजिक अपेक्षाओं से अलग है। पार्वती ने शिव के प्रति अपना विश्वास प्रकट किया। वे निन्दा सुनकर अपने निर्णय से नहीं हटीं। तब शिव ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और उनके प्रेम को स्वीकार किया।
विवाह का प्रस्ताव हिमवान के घर पहुँचा। देवताओं, ऋषियों और शिवगणों की बारात का वर्णन पुराण में उत्सव और विविधता के साथ आता है। शिव के गणों को देखकर मैना का चकित होना और फिर शिव के मंगलमय रूप का दर्शन करना भी विवाह की कथा का एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है।
विधिपूर्वक शिव-पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ। परिवार और देवताओं ने मंगलगान किया। यह कथा पार्वती की सक्रिय इच्छा, उनके संकल्प और शिव की स्वीकृति—दोनों को स्थान देती है। योग और गृहस्थ जीवन यहाँ विरोधी होकर नहीं, एक ही दिव्य जीवन के दो पक्ष बनकर सामने आते हैं।
स्रोत और पाठ-संस्करण
स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं।
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