पुराण कथा · देवनागरी पाठ

मार्कण्डेय ऋषि की कथा

स्रोताधारित हिन्दी कथारूपान्तरण। मूल ग्रन्थ के प्रसंग और इस संस्करण का सन्दर्भ साथ दिया गया है।

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स्रोत: मूल ग्रन्थ-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी कथारूपान्तरण · संदर्भ पाठ

मार्कण्डेय ऋषि की कथा — हिन्दी कथारूपान्तरण

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मार्कण्डेय ऋषि दीर्घकाल तक तप, संयम और भगवान के स्मरण में लगे रहे। श्रीमद्भागवत के इस प्रसंग में उनकी कथा किसी निश्चित आयु की भविष्यवाणी के रूप में नहीं, भगवान की माया के अनुभव के रूप में आती है। नर-नारायण ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए। ऋषि ने उनकी वह माया देखने की इच्छा की जिससे जगत मोहित होता है। एक दिन मार्कण्डेय ने अत्यन्त प्रबल वर्षा और चारों ओर फैलते प्रलय के जल का अनुभव किया। परिचित भूमि, आश्रम और दिशाएँ ओझल हो गईं। वे जलराशि में भटकते रहे। बहुत समय बाद उन्हें एक वटवृक्ष और उसके पत्ते पर लेटा हुआ अलौकिक बालक दिखाई दिया। बालक शान्त था। उसके श्वास के साथ ऋषि ने अपने को उसके भीतर प्रवेश करता पाया। वहाँ उन्होंने वही सृष्टि, पर्वत, नदियाँ, प्राणी और अपना आश्रम तक देखा। फिर वे बाहर आए और उस अद्भुत बालरूप की ओर बढ़े। दृश्य लुप्त हुआ और वे अपने आश्रम में थे। बाद में शिव और पार्वती ने ऋषि को दर्शन दिए और उनकी भक्ति की प्रशंसा की। मार्कण्डेय ने भगवान में अविचल भक्ति और भक्तों के प्रति सद्भाव की इच्छा की। कथा मनुष्य के सीमित अनुभव और परम सत्ता की व्यापकता के बीच का अन्तर प्रकट करती है।
स्रोत और पाठ-संस्करण

स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं। https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AE&oldid=112864 https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AF&oldid=112866 https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A6&oldid=96437