मथुरा में कंस ने अपनी बहन देवकी और वसुदेव को बन्दी बना रखा था। उसे भय था कि देवकी का पुत्र उसका अन्त करेगा। उसने अपनी सत्ता बचाने के लिए परिवार पर अत्याचार किए। देवकी के गर्भ में भगवान के प्राकट्य का समय आया तो कारागार का वातावरण अलौकिक प्रकाश से भर गया।
भागवत में देवकी और वसुदेव पहले भगवान का चतुर्भुज रूप देखते हैं। उन्होंने स्तुति की और शिशु की रक्षा के लिए चिन्ता प्रकट की। भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया। फिर वे सामान्य बालक का रूप धारण कर लेते हैं। वसुदेव को बालक को गोकुल में नन्द के घर पहुँचाने का निर्देश मिला।
उस रात पहरेदार सो गए, बन्धन खुल गए और मार्ग मिल गया। वसुदेव बालक को लेकर यमुना पार करने निकले। वर्षा के बीच शेषनाग ने छत्र की तरह आश्रय दिया। गोकुल पहुँचकर उन्होंने बालक को यशोदा के पास रखा और वहाँ जन्मी बालिका को लेकर वापस कारागार आ गए।
कंस ने बालिका को मारना चाहा, पर वह उसके हाथ से छूटकर दिव्य रूप में प्रकट हुई और बोली कि उसका संहार करने वाला जन्म ले चुका है। इस प्रकार कृष्ण का पालन नन्द और यशोदा के घर प्रारम्भ हुआ। कथा भय और अत्याचार के बीच आशा तथा रक्षा के लिए उठाए गए साहसी कदमों को सामने लाती है।
स्रोत और पाठ-संस्करण
स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं।
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