पुराण कथा · देवनागरी पाठ

कूर्म अवतार की कथा

स्रोताधारित हिन्दी कथारूपान्तरण। मूल ग्रन्थ के प्रसंग और इस संस्करण का सन्दर्भ साथ दिया गया है।

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स्रोत: मूल ग्रन्थ-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी कथारूपान्तरण · संदर्भ पाठ

कूर्म अवतार की कथा — हिन्दी कथारूपान्तरण

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देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन आरम्भ किया। मन्दराचल पर्वत मथानी बना और वासुकि नाग रस्सी बने। दोनों पक्ष अपनी-अपनी ओर से खींच रहे थे, लेकिन एक बड़ी कठिनाई सामने आई: भारी पर्वत का कोई स्थिर आधार नहीं था और वह जल में धँसने लगा। कई लोगों का मिलकर प्रयत्न करना भी पर्याप्त नहीं हुआ। विष्णु ने विशाल कछुए का रूप धारण किया। वे समुद्र के भीतर गए और मन्दराचल को अपनी पीठ पर टिकाया। पर्वत स्थिर हुआ तो मंथन फिर चल सका। पुराण का वर्णन भगवान को ऊपर दिखाई देने वाले कार्य के नीचे अदृश्य आधार के रूप में प्रस्तुत करता है। देवता और असुर जिस उपलब्धि की आशा कर रहे थे, उसके लिए यह आधार अनिवार्य था। आगे मंथन से विष, रत्न और अन्ततः अमृत निकले। कूर्म अवतार की कथा को समुद्र मंथन से अलग किसी असम्बद्ध घटना की तरह नहीं समझना चाहिए। यह उसी प्रसंग का आधार देने वाला निर्णायक भाग है। कथा धैर्य, स्थिरता और ऐसे सहयोग का महत्त्व दिखाती है जिसकी भूमिका सामने कम दिखाई दे, फिर भी जिसके बिना पूरा कार्य रुक जाए।
स्रोत और पाठ-संस्करण

स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं। https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%AE/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD&oldid=342574