पुराण कथा · देवनागरी पाठ

शिवलिंग प्राकट्य की कथा

स्रोताधारित हिन्दी कथारूपान्तरण। मूल ग्रन्थ के प्रसंग और इस संस्करण का सन्दर्भ साथ दिया गया है।

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स्रोत: मूल ग्रन्थ-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी कथारूपान्तरण · संदर्भ पाठ

शिवलिंग प्राकट्य की कथा — हिन्दी कथारूपान्तरण

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ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हुआ। दोनों अपने-अपने कार्य और महिमा को बड़ा बता रहे थे। विवाद बढ़ने पर उनके बीच प्रकाश का एक अनन्त स्तम्भ प्रकट हुआ। उसका न आरम्भ दिखाई देता था, न अन्त। उसे जानने के लिए दोनों ने अलग दिशाओं में जाने का निश्चय किया। विष्णु वराह रूप में नीचे की ओर और ब्रह्मा हंस रूप में ऊपर की ओर गए। बहुत खोजने पर भी सीमा नहीं मिली। विष्णु लौटकर स्वीकार करने को तैयार हुए कि वे अन्त नहीं पा सके। शिवपुराण के इस पाठ में ब्रह्मा और केतकी के साक्ष्य से जुड़ा असत्य का प्रसंग भी आता है। तब उस ज्योति से शिव प्रकट हुए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनन्त तत्त्व को सीमित अहंकार और स्पर्धा से नहीं नापा जा सकता। असत्य साक्ष्य की आलोचना हुई और सत्य स्वीकार करने की महिमा स्थापित हुई। भगवान ने अपनी उपासना के लिंगरूप और उसके महत्त्व का उपदेश दिया। इस घटना को लिंगोद्भव कहा जाता है। यहाँ लिंग को अनन्त ज्योति के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कथा का मुख्य प्रश्न यह नहीं कि कौन दूसरे को नीचा दिखाए, बल्कि यह है कि अनन्त के सामने अपनी सीमा को कौन ईमानदारी से स्वीकार करे।
स्रोत और पाठ-संस्करण

स्रोताधारित स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; मूल श्लोकों का अक्षरशः अनुवाद नहीं। https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A5%A7_%28%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%29/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AD&oldid=65358