व्रत कथा · देवनागरी पाठ

प्रदोष व्रत कथा

सन्दर्भ और पाठ-परम्परा सहित हिन्दी कथात्मक परिचय।

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स्रोत: स्रोत-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी रूपान्तरण · संदर्भ पाठ

प्रदोष व्रत कथा — हिन्दी रूपान्तरण

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प्रदोष की लोकप्रचलित कथा के एक रूप में एक निर्धन ब्राह्मणी अपने पुत्र का पालन करती थी। उसे एक अन्य बालक मिला जो संकटग्रस्त राजपरिवार से सम्बन्धित था। उसने उसे भी अपना लिया। इस प्रकार उसके छोटे घर में अपने और पराए का भेद किए बिना दोनों का पालन हुआ। आगे ऋषि के मार्गदर्शन से शिव की आराधना और प्रदोष-व्रत की परम्परा आई। बालक बड़े हुए। राजकुमार का सम्बन्ध गन्धर्वकन्या अंशुमती से हुआ। कथा के अनुसार उसे गन्धर्वों की सहायता मिली और अपने खोए राज्य को वापस पाने का अवसर प्राप्त हुआ। राज्य मिलने पर उसने पालन करने वाली ब्राह्मणी और अपने साथ बड़े हुए बालक का उपकार नहीं भुलाया। कथा संकट में मिले आश्रय, दीर्घ धैर्य और कृतज्ञता को शिवभक्ति के साथ जोड़ती है। यह प्रचलित व्रतकथारूप है। विभिन्न पुस्तिकाओं में ऋषि, पात्रों और घटनाओं के पाठांतर मिलते हैं। प्रदोष की वास्तविक तिथि और सन्ध्याकाल का समय स्थान के अनुसार अलग पंचांग से देखना चाहिए; यह पाठ समय-गणना का विकल्प नहीं है।
स्रोत और पाठ-संस्करण

Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित। https://www.drikpanchang.com/vrat-katha/pradosha/soma-pradosha/soma-pradosha-vrat-katha.html?lang=hi