एकादशी से सम्बन्धित अनेक कथाएँ हैं। इस पाठ में भागवत का अम्बरीष और दुर्वासा वाला प्रसंग लिया गया है; इसे वर्ष की सभी एकादशियों की अलग-अलग कथा का स्थानापन्न नहीं कहा गया है। राजा अम्बरीष भगवान विष्णु के भक्त थे। वे अपनी इन्द्रियों और राजकार्य को भक्ति से जोड़कर देखते थे।
एक बार व्रत के पारण के समय ऋषि दुर्वासा अतिथि बने। वे स्नान के लिए गए और लौटने में विलम्ब हुआ। राजा के सामने अतिथि की प्रतीक्षा और पारण का समय—दोनों का प्रश्न था। विद्वानों के परामर्श से उन्होंने केवल जल ग्रहण किया और भोजन के लिए ऋषि की प्रतीक्षा की।
दुर्वासा को यह बात बुरी लगी। क्रोध में उन्होंने राजा को दण्डित करने के लिए शक्ति उत्पन्न की। भगवान के सुदर्शन ने राजा की रक्षा की और दुर्वासा को ही पीछा करते हुए संकट में डाल दिया। वे कई स्थानों पर शरण खोजते हुए अन्ततः विष्णु के पास पहुँचे।
भगवान ने उन्हें अम्बरीष के पास जाकर क्षमा माँगने को कहा। राजा ने उनके लिए प्रार्थना की और संकट दूर हुआ। दोनों ने मिलकर भोजन किया। इस कथा का मुख्य विषय केवल भोजन का समय नहीं, अतिथि-सम्मान, विनम्रता, क्षमा और क्रोध के परिणाम हैं। वास्तविक पारण की तिथि और समय अलग पंचांग तथा परम्परा से देखे जाते हैं।
स्रोत और पाठ-संस्करण
Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित।
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