व्रत कथा · देवनागरी पाठ

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

सन्दर्भ और पाठ-परम्परा सहित हिन्दी कथात्मक परिचय।

ऑडियो प्लेयर खोलें

स्रोत: स्रोत-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी रूपान्तरण · संदर्भ पाठ

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा — हिन्दी रूपान्तरण

इस अध्याय का ऑडियो खोलें

गणेश-व्रत से जुड़ी लोककथाओं में एक वृद्धा की कथा प्रसिद्ध है। वह श्रद्धा से गणेश की पूजा करती थी। उसके परिवार में धन का अभाव था और उसकी दृष्टि भी नहीं थी। कथा में गणेश प्रसन्न होकर उसे वर माँगने का अवसर देते हैं। वृद्धा ने परिवार से सलाह ली। किसी ने धन माँगने को कहा, किसी ने सन्तान का सुख और किसी ने उसके अपने नेत्रों की बात कही। वह चाहती थी कि वर से केवल उसका नहीं, पूरे परिवार का हित हो। उसने ऐसी प्रार्थना की कि वह अपने पोते को सोने के कटोरे में दूध पीते हुए देख सके। इस एक इच्छा में दृष्टि, परिवार की वृद्धि और सम्पन्नता—तीनों का भाव आ गया। गणेश उसकी बुद्धि से प्रसन्न हुए और लोककथा सुखद आशीर्वाद पर समाप्त होती है। यह सकट अथवा तिलचौथ की परम्पराओं में सुनाई जाने वाली कथाओं का एक रूप है। प्रत्येक मास की संकष्टी की अलग कथा और गणेशरूप भी मिलते हैं; इस एक कहानी को उन सबका एकमात्र मूल पाठ नहीं कहा गया है। कथा का प्रिय पक्ष परिवार का विचार, विनम्र प्रार्थना और सूझबूझ है।
स्रोत और पाठ-संस्करण

Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित। https://www.bhaktibharat.com/prerak-kahani/shri-ganesh-aur-budhiya-mai-ki-kahani