व्रत कथा · देवनागरी पाठ
शुक्रवार वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
शुक्रवार वैभव लक्ष्मी व्रत कथा — प्रचलित हिन्दी कथापाठ, अध्यायों और स्रोत सहित।
स्रोत: hindu-devotional-texts 0.7.0 — Ishank Gupta and contributors, MIT. Attribution and permission: /shravan/library-sources.txt · संदर्भ पाठ
शीला की कथा
एक समय की बात है कि एक शहर में शीला नाम की एक स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। शीला स्वभाव से धार्मिक प्रवृत्ति की थी और भगवान की कृपा से उसे जो भी प्राप्त हुआ था, वह उसी में सन्तोष करती थी। शहरी जीवन वह जरूर व्यतीत कर रही थी, परन्तु शहर के जीवन का रंग उस पर नहीं चढ़ा था। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव और परोपकार का भाव उसमें अभी भी था।
वह अपने पति और अपनी गृहस्थी में प्रसन्न थी। आस-पड़ोस के लोग भी उसकी सराहना किया करते थे। देखते ही देखते समय बदला और उसका पति कुसङ्गति का शिकार हो गया। वह शीघ्र अमीर होने का ख्वाब देखने लगा। अधिक से अधिक धन प्राप्त करने के लालच में वह गलत मार्ग पर चल पड़ा। बुरे मित्रों के साथ रहने के कारण उसमें शराब, जुआ, रेस और नशीले पदार्थों के सेवन की आदत उसे पड़ गई।
इन गन्दी आदतों में उसने अपना सब धन गँवा दिया। जुए में पारिवारिक बचत समाप्त हो गई, और जब वह भी न रही तो उसने शीला के गहने तक गिरवी रख दिये। जीवन में रास्ते से भटकने के कारण उसकी स्थिति भिखारी जैसी हो गई। वह घर जो कभी सुख-सुविधा से परिपूर्ण था, अब इतनी दरिद्रता में पहुँच गया कि कई दिन ऐसे आते जब दोनों को भरपेट भोजन भी नसीब न होता।
अपने घर और अपने पति की यह स्थिति देखकर शीला बहुत दुःखी रहने लगी। परन्तु वह भगवान पर आस्था रखने वाली स्त्री थी। उसे अपने देव पर पूरा विश्वास था। पति की कटु वाणी एवं अपमान को वह बिना शिकायत के सहती रही। हर कष्ट के बीच भी उसने माँ लक्ष्मी पर अपनी श्रद्धा एवं अपने कोमल-धैर्यवान हृदय को नहीं खोया।
एक दिन दोपहर के समय उसके घर के दरवाजे पर किसी ने आवाज दी। दरवाजा खोलने पर सामने पड़ोस की माँजी खड़ी थीं। माँजी के चेहरे पर एक विशेष तेज था। वह करुणा एवं स्नेह की देवी नजर आ रही थीं। शीला उन माँजी को घर के अन्दर ले आई। घर में बैठने के लिये कुछ खास व्यवस्था नहीं थी। शीला ने एक फटी हुई चादर पर उन्हें बिठाया। माँजी बोलीं, "क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मन्दिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहाँ आती हूँ।"
माँजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। माँजी के व्यवहार से शीला को काफी सम्बल मिला और सुख की आस में उसने माँजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई। कहानी सुनकर माँजी ने कहा, "माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।"
शीला के पूछने पर माँजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। माँजी ने कहा, "बेटी! माँ लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-सम्पत्ति और यश प्राप्त करता है। यह व्रत शुक्रवार के दिन इक्कीस शुक्रवार तक रखा जाता है और इक्कीसवें शुक्रवार को उद्यापन-विधि से सम्पन्न किया जाता है।"
शीला यह सुनकर आनन्दित हो गई। शीला ने सङ्कल्प करके आँखें खोलीं तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि माँजी कहाँ गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि माँजी और कोई नहीं, साक्षात् लक्ष्मीजी ही थीं।
दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने माँजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिर में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।
व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरन्त शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़-सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शान्ति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं।
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन-विधि करके सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वन्दन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं — "हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे सन्तान न हो, उसे सन्तान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखण्ड रखना। कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।" ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को प्रणाम किया।
स्रोत और पाठ-संस्करण
https://app.unpkg.com/hindu-devotional-texts@0.7.0/files/dist/kathas/vaibhav-lakshmi/chapters/sheela.js; hindu-devotional-texts 0.7.0 — Ishank Gupta and contributors, MIT. Attribution and permission: /shravan/library-sources.txt; प्रचलित हिन्दी कथारूप, कथा का फलश्रुति-वर्णन आस्थापरम्परा का भाग है।