देवी कथा · देवनागरी पाठ
माँ लक्ष्मी की कथा
सन्दर्भ और पाठ-परम्परा सहित हिन्दी कथात्मक परिचय।
स्रोत: स्रोत-सन्दर्भ सहित Divyadindarshan का हिन्दी रूपान्तरण · संदर्भ पाठ
माँ लक्ष्मी की कथा — हिन्दी रूपान्तरण
क्षीरसागर के मंथन से अनेक रत्न प्रकट हो रहे थे। देवता और असुर दोनों उस महान प्रयत्न में लगे थे। उसी समय कमल के समान शोभा वाली लक्ष्मी प्रकट हुईं। उनके आगमन से सब ओर मंगल और सौन्दर्य का अनुभव हुआ।
ऋषियों ने स्तुति की और देवताओं ने उनका अभिषेक तथा सम्मान किया। लक्ष्मी ने सबको देखा। केवल बल, वैभव या बाहरी रूप उनके वरण का पर्याप्त आधार नहीं था। कथा में वे ऐसे आश्रय का चयन करती हैं जो गुण, स्थिरता और समत्व से युक्त हो।
उन्होंने विष्णु को अपना वरण किया और उनके वक्षस्थल से सम्बन्धित हुईं। देवता प्रसन्न हुए। मंथन का क्रम आगे चला और अन्ततः धन्वन्तरि अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए।
लक्ष्मी का स्वरूप केवल सिक्कों की प्राप्ति तक सीमित नहीं है। परम्परा में श्री, मंगल, शोभा और पोषण से भी उनका सम्बन्ध है। समुद्र मंथन की यह कथा उनके स्वतन्त्र वरण और दिव्य गुणों के प्रति आकर्षण को स्थान देती है। श्रद्धालु दीपावली तथा अन्य अवसरों पर लक्ष्मी की आराधना करते हुए कृतज्ञता और सुव्यवस्थित गृहजीवन का भाव रखते हैं।
स्रोत और पाठ-संस्करण
Divyadindarshan का स्वतन्त्र हिन्दी रूपान्तरण; उद्धृत स्रोतों के प्रसंग/परम्परा पर आधारित। https://sa.wikisource.org/wiki/श्रीमद्भागवतपुराणम्/स्कन्धः_८/अध्यायः_८